छात्रों ने स्मार्ट खेती के लिए बनाई एआई और आईओटी आधारित ई-परिरक्षक खेती तकनीक

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नई दिल्ली, 23 फरवरी पंजाब के एक निजी विश्वविद्यालय के छात्रों ने स्मार्ट खेती के लिए एआर्ई कृत्रिम मेधाी और आईओर्टी इंटरनेट फ थिंग्सी आधारित प्रणाली ई-परिरक्षक का आविष्कार किया है। इस उपकरण को किसी कृषि क्षेत्र की निगरानी करने के लिहाज से बनाया गया है, जिसके माध्यम से जमीन में पानी के स्तर की जानकारी रखने के साथ-साथ पंप, ब्लोअर और छिड़काव सिंचार्ई स्प्रिंकली को दूर बैठकर भी नियंत्रित किया जा सकेगा। 

जलंधर के लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिर्टी एलपीयूी के छात्रों ने अपने शिक्षकों की मदद से इस प्रौद्योगिकी का विकास अपने शिक्षकों की मदद से की है। इसे पेटेन्ट कराने का प्रयास है। यह उपकरण तापमान, आर्द्रता, मिट्टी के पीएच स्तर, मिट्टी की नमी और जल स्तर की निगरानी कर सकता है विश्वविद्यालय की विज्ञ्प्ति के अनुसार इस परियोजना पर काम करने वाले विश्वविद्यालय के स्कूल फ इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में प्रोफेसर राजेश सिंह ने कहा, ई-परिक्षेत्र के साथ, हम अपने किसानों के लिए आज की अत्याधुनिक तकनीक जैसे एआर्ई कृत्रिम बुद्धिमत्ताी और आईओटी के आधार पर काम कर रहे हैं।  

उन्होंने कहा कि इस उपकरण से किसान अपने खेत की गुणवत्ता, मिट्टी की रूपरेखा के साथ-साथ नमी की सही जानकारी प्राप्त करने के साथ साथ दूर से अपने खेत की निगरानी करने में सक्षम होंगे। इसके माध्यम से किसान छिड़काव सिंचाई और पंप जैसे जमीनी उपकरणों पर नियंत्रण रख सकेंगे और दूर बैठे बैठे इन्हें खोल या बंद कर सकेंगे। सिंह ने कहा कि उत्पादकता बढ़ाने में सहायक ई-परिक्षेत्र एक पूर्ण कृषि सूचना और क्षेत्र विकास प्रणाली है। इस यंत्र द्वारा एकत्र किए गए डेटा को भविष्य के किसी भी विश्लेषण के लिए क्लाउड में संग्रहीत किया जाता है।  

ई-परिरक्षक में कई सेंसर नोड्स लगे होते हैं। इन्हें फील्ड में तैनात किया जा सकता है और एलसीडी स्क्रीन के माध्यम से अपने खेत के बारे में तमाम जानकारियां प्राप्त कर सकता है। यह प्रणाली उन्नत मशीन लनिÓग एल्गोरिदम के माध्यम से क्षेत्र से एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण करता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस क्षेत्र में किस फसल की खेती सबसे उपयुक्त होगी। 

यही नहीं, यह उपकरण फसल में किसी भी बीमारी या संक्रमण का भी पता लगाता है। इस यंत्र को इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता नहीं है और स्टार टोपोलॉजी या स्टार नेटवर्क व्यवस्था के साथ यह 10 किमी की सीमा के भीतर काम करता है। आवश्यक हो तो नेटवर्किग व्यवस्था में बदलाव कर के इसकी सीमा भी बढ़ाई जा सकती है। (भाषा)