नयी दिल्ली, 01 अक्टूबर 2025 (भाषा)
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)ने मंगलवार को अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस इन्फ्रा के खिलाफ फेमा जांच के तहत महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में तलाशी ली। उन्होंने बताया कि मुंबई और इंदौर के महू में कम से कम छह परिसरों पर छापेमारी की गई।
तलाशी फेमा जांच का हिस्सा
आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि ये तलाशी विदेश में कुछ अवैध धन प्रेषण के आरोपों पर रिलायंस इन्फ्रा के खिलाफ चल रही विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) जांच का हिस्सा है।
ईडी 17,000 करोड़ के मामले में कर रही जांच
ईडी पहले से ही धन शोधन निवारण अधिनियम के आपराधिक प्रावधानों के तहत अनिल अंबानी के समूह की कई कंपनियों, जिनमें रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (आर इंफ्रा) भी शामिल है, द्वारा कथित वित्तीय अनियमितताओं और 17,000 करोड़ रुपये से अधिक के सामूहिक ऋण ‘डायवर्जन’ की जांच कर रही है।
पीएमएलए के तहत एजेंसी की यह कार्रवाई सेबी की एक रिपोर्ट के बाद हुई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आर इंफ्रा ने सीएलई नामक एक कंपनी के माध्यम से रिलायंस समूह की कंपनियों में अंतर-कॉर्पोरेट जमा (आईसीडी) के रूप में धन दूसरे कामों में लगाया। यह आरोप लगाया गया था कि आर इंफ्रा ने शेयरधारकों और ऑडिट पैनल से अनुमोदन से बचने के लिए सीएलई को अपने ‘संबंधित पक्ष’ के रूप में प्रकट नहीं किया।
रिलायंस समूह ने गड़बड़ी से किया था इनकार
रिलायंस समूह ने पहले किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया था और एक बयान में कहा था कि 10,000 करोड़ रुपये की कथित राशि को एक अज्ञात पक्ष को हस्तांतरित करने का आरोप 10 साल पुराना मामला है और कंपनी ने अपने वित्तीय विवरणों में कहा था कि उसका जोखिम केवल लगभग 6,500 करोड़ रुपये था। रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने लगभग छह महीने पहले, 9 फरवरी, 2025 को इस मामले का सार्वजनिक रूप से खुलासा किया था।
रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर का आया बयान
कंपनी ने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा आयोजित अनिवार्य मध्यस्थता कार्यवाही और माननीय बंबई उच्च न्यायालय के समक्ष दायर मध्यस्थता वाद के माध्यम से, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर 6,500 करोड़ रुपये के अपने 100 प्रतिशत जोखिम की वसूली के लिए एक समझौते पर पहुंची।’’ बयान के अनुसार, अंबानी तीन साल से अधिक समय (मार्च 2022 से) से आर इंफ्रा के बोर्ड में नहीं थे।
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